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Fortis Hospital मुलुंड ने मध्य मुंबई में पहला मूवमेंट डिसऑर्डर एंड डीबीएस क्लीनिक खोला

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फोर्टिस अस्पताल (Fortis Hospital) मुलुंड ने मूवमेंट डिसऑर्डर एंड डीबीएस क्लीनिक का शुभारंभ किया। यह चलने-फिरने में तरह-तरह की परेशानी महसूस करने वाले लोगों के इलाज के लिए एक समर्पित सुविधा है। यहां डायस्टोनिया, ट्रेमर्स, चेहरे पर आने वाली ऐंठन यानी हेमिफेशियल स्‍पाज्‍़म और एटैक्सिया का इलाज किया जाता है। इस यूनिट का उद्घाटन न्यूरो और स्पाइन सर्जरी के सीनियर कंसल्‍टेंट डॉ. गुरनीत सिंह साहनी और मुलुंड स्थित फोर्टिस अस्पताल के फैसिलिटी डायरेक्टर डॉ. विशाल बेरी ने किया। इस अवसर पर पहले चलने-फिरने में परेशानी महसूस करने वाले और अब अपना सफलतापूर्वक इलाज करा चुके मरीज भी मौजूद थे।

मूवमेंट डिसऑर्डर क्लीनिक का संचालन डॉ. गुरनीत सिंह साहनी की अगुवाई में उनकी टीम करेगी। इस टीम में मूवमेंट डिसऑर्डर विशेषज्ञ डॉ. अनिल वेंकट चलम और डॉ. सईद मोइद जफर शामिल है। यह क्लीनिक मरीजों की बीमारी और स्थिति की पूरी तरह से जांच कर व्यक्तिगत उपचार योजना प्रदान करता है। इनमें न्यूरोलॉजिस्ट्स से सलाह, मेडिकशन थेरेपी, बोटोक्स के इंजेक्शन और संभावित सर्जरी शामिल है। इलाज के तहत मरीज की स्टीरियोटैक्टिक सर्जरी, रेडियो फ्रीक्‍वेंसी सर्जरी, डीप ब्रेन स्टिम्युलेशन (डीबीएस) करने के साथ रोगियों में शारीरिक और संज्ञान लेने की शक्तियां फिर से विकसित की जाती है। इसके अलावा साइकोथेरेपी से भी मरीजों का इलाज किया जाता है।

Fortis Hospital मुलुंड में न्यूरो और स्पाइन सर्जरी के सीनियर कंसलटेंट डॉ. गुरनीत सिंह साहनी ने कहा, “चलने-फिरने में गड़बड़ी या परेशानी लंबे समय से चली आ रही पुरानी बीमारी का नतीजा होती है, जो मरीजों और उनके परिवार के लिए काफी चुनौतियां पैदा करती हैं। मरीजों की जांच के बाद देखा गया है कि पिछले कुछ सालों से इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं। इस समय चलने-फिरने में होने वाली परेशानी से प्रति 10 लाख लोगों में से 60 से 100 लोग पीड़ित है। यह याद रखना बहुत जरूरी है कि इस बीमारी को दूर करने और मरीजों का जीवन-स्तर सुधारने के लिए इलाज के विकल्प उपलब्ध हैं।’

चलने-फिरने की बीमारी से पीड़ित लोगों के इलाज की प्रक्रिया तब और भी जटिल हो जाती है, जब इसके काफी गंभीर लक्षण दिखते हैं। हाथ पैरों का न चाहते हुए हिलना और हाथ पैरों में कंपकंपी को अक्सर इलाज कराने योग्य बीमारी न मानकर पारिवारिक लक्षण नाम कर खारिज कर दिया जाता है। इससे मरीजों को अक्सर शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। हालांकि, इस तरह की धारणाएं लोगों की जिंदगी पर असर डालती है, इसलिए इस तरह की बीमारियों का समय पर इलाज और जांच कराना काफी महत्वपूर्ण हो जाता है। मूवमेंट डिसऑर्डर क्‍लीनिक में टीम मरीजों के इलाज के लिए नई तकनीकी और वैज्ञानिक प्रगति का सहारा लेने के लिए पूरी तरह समर्पित है। यहां टीम की ओर से रोगियों का बेहतर ढंग से इलाज के लिए नई चिकित्सा तकनीक को अपनाया जाता है।

चलने-फिरने और कोई काम करने में दिक्कत महसूस करने वाले मरीजों के लिए मूवमेंट डिसऑर्डर एंड डीबीएस क्लीनिक की जरूरत पर जोर देते हुए डॉ. गुरनीत सिंह साहनी ने कहा, “आम धारणा के विपरीत चलने-फिरने में दिक्कत या परेशानी किसी भी उम्र में महसूस की सकती है। यह केवल बुजुर्गों को ही नहीं होती, जैसा कि अक्सर माना जाता है। हालांकि, पार्किंसन रोग बुढ़ापे से जुड़ा है, कई स्थितियों जैसे डायस्टोनिया का जेनेटिक आधार होता है, इस कारण यह बीमारी नौजवानों में भी दिखाई देती है। मरीजों की बढ़ती हुई तादाद से संपूर्ण विशेषज्ञता रखने वाले मूवमेंट डिसऑर्डर एंड डीबीएस क्‍लीनिक की जरूरत महसूस होने लगी है, जिससे अलग-अलग बीमारी से पीड़ित रोगियों की अलग-अलग चिकित्सा संबंधी जरूरतों को प्रभावी ढंग से पूरा किया जा सके।’’ 

मूवमेंट डिसऑर्डर के क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण चुनौती इस स्थिति को लेकर जागरूकता का अभाव है। पब्लिक के साथ कई अस्पतालों के डॉक्टरों में इस बीमारी को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं है। चलने–फिरने में दिक्कत या परेशानी का दायरा अलग-अलग मरीजों में अलग-अलग हो सकता है। उदाहरण के लिए हाथ पैरों में कंपन से पीडि़त मरीज अजीबीगरीब हरकतें कर सकता है। जबकि पार्किंसन बीमारी से पीड़ित मरीजों में धीमी और हाथ-पैरों को झटकने की आदत देखी जा सकती है। बीमारी के इन अलग-अलग लक्षणों के बावजूद दोनों ही तरह के मरीजों को इलाज की जरूरत होती है, जो मूवमेंट डिसऑर्डर एंड डीबीएस क्लीनिक में विशेषज्ञों की देखरेख में इलाज से प्रभावी ढंग से पूरी हो सकती हैं। 

मुलुंड के फोर्टिस अस्पताल में फैसिलिटी डायरेक्टर डॉ. विशाल बेरी ने कहा, “चलने-फिरने में होने वाली गड़बड़ियों के प्रति मरीजों को जागरूक करने की जरूरत काफी तेजी से उभर रही है। इससे मरीजों को जल्दी जांच कराने और इलाज शुरू करने में मदद मिल सकती है। चलने-फिरने में मरीजों को होने वाली परेशानी से रोगियों और उनके परिवारों पर भावनात्मक बोझ बढ़ जाता है। चिकित्‍सा उपचार के साथ थेरेपी से, जिसमें मनोवैज्ञनिकों से सलाह और समर्थन व मदद देने वाले समूह शामिल हैं, हम मरीजों का इलाज करते हैं। इससे हम मरीजों को अपनी स्थिति सकारात्मक और प्रभावी ढंग से मैनेज करने में मदद करना चाहते हैं।’’ 

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